Thursday, January 29, 2026

कुछ पंखुड़ियाँ गुलाब की ...

 नए युग

नई सभ्यता

विचार और दर्शन में

तुम्हें शायद वो भले न मिले

पर मुझे तो 

तुम्हारे चारों ओर

पीली सरसों

हरे धान के खेतों

अविरल बहते झरनों

और पर्वतों-मैदानों-घाटों में 

उमड़ते बादलों पर

क़दम-क़दम पर मिल ही जाती हैं

बारिश की बूँदों से लदी

कुछ पंखुड़ियाँ गुलाब की ।

"विवेक तिवारी"